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कविता - “जीवन रस”

कविता - “जीवन रस”



वर्तमान बना सुखद घनेरा,
भविष्य किसने है देखा
क्यों कुढ़ता मन भीत मनोरे,
मीनमेख निकलत ऐसा l  
जीवन का रस आज घनेरे,
पल-पल बीता जाए !
श्या जितना बटोर सके तो,
उतना सुख दिन आये l
नित्य दिन अंधकार बने है,
तिल-तिल घटता जाये
बिन पैरी समय चलत है,
कभी न थकता जाए l
घटत पहरी प्रीत न्यारी,
मनका फिरता जाए l
मन लागत जब प्रेम देहरी,
घट उज्यारा हो जाए l
प्रभु लगन जब लगी घट में,
नश्वर मोह भंग हो जाए l
श्या प्रीत प्रभु चरणों में,
स्थूल भ्रम दूर हो जाए l
 
लेखक / कवी
श्याम कुमार कोलारे 

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